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आईआरसीटीसी टेंडर नीति 2010 पर जांच के आदेश, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने रेलवे बोर्ड से मांगी रिपोर्ट

यह मामला उस समय से जुड़ा है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)-2 सरकार में रेल मंत्री बनीं।

06 Jan 2026

आईआरसीटीसी टेंडर नीति 2010 पर जांच के आदेश, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने रेलवे बोर्ड से मांगी रिपोर्ट

कोलकाता। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2010 की भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) टेंडर नीति में कथित अल्पसंख्यक आरक्षण को लेकर जांच के निर्देश दिए हैं। आयोग की एक पीठ ने रेलवे बोर्ड को शिकायत की जांच कर उचित कानूनी कार्रवाई करने को कहा है। यह मामला उस समय से जुड़ा है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)-2 सरकार में रेल मंत्री बनीं।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, आईआरसीटीसी की टेंडर प्रक्रिया में रेलवे कैटरिंग स्टॉल और कैंटीन के संचालन से जुड़े ठेकों के लिए अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण का प्रावधान किया गया था। शिकायत में आरोप है कि इस बदलाव के कारण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए तय वैधानिक आरक्षण में कटौती हुई, जिसका लाभ मुस्लिम समुदाय को दिया गया, जबकि संविधान में ऐसा प्रावधान नहीं है।

बता दें कि, वर्ष 2009 में कोलकाता दक्षिण सीट से लगातार छठी बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी रेल मंत्री बनी थीं। बाद में 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसी अवधि के दौरान टेंडर नीति में बदलाव किए जाने का आरोप है।

यह मामला हाल ही में लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी नामक संगठन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में लाया था। इसके बाद आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने रेलवे बोर्ड को नोटिस जारी कर जांच के निर्देश दिए।

शिकायत में कहा गया है कि श्रेणी ए, बी और सी में अल्पसंख्यकों के लिए तीन प्रतिशत और श्रेणी डी, ई और एफ में 9.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। संगठन का दावा है कि यह कदम तुष्टीकरण की नीति के तहत उठाया गया और इससे आरक्षित वर्गों के अधिकारों का हनन हुआ।

उल्लेखनीय है कि, पिछले वर्ष कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 2010 के बाद राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए सभी अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र रद्द कर दिए थे, यह कहते हुए कि इनमें से अधिकांश धर्म के आधार पर जारी किए गए थे।

वहीं, हाल ही में चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट किया है कि 2010 के बाद जारी ऐसे प्रमाण पत्रों को राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान पहचान के सहायक दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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