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उन्होंने टिप्पणी की कि बजट सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया है
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के एक ताजा बयान ने राजनीतिक गलियारे में भूचाल ला दिया है। शिक्षक भर्ती घोटाले में जमानत पर बाहर आए पार्थ चटर्जी ने अपनी पुरानी विधानसभा बेहाला पश्चिम के चुनावी समीकरणों पर टिप्पणी करते हुए संकेतों में बहुत कुछ कह दिया है। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर बदलते शक्ति संतुलन और उनके भविष्य के दांव के तौर पर देखा जा रहा है। अतीत की याद और भविष्य पर सवाल बेहाला में अपनी राजनीतिक पकड़ का जिक्र करते हुए पार्थ चटर्जी ने कहा कि जब मैं सक्रिय था, तब बेहाला में चुपचाप फूल के निशान पर मुहर लगती थी। अब कौन, कहां मुहर लगाएगा, मैं नहीं जानता। शायद आज भी वही स्थिति हो, लेकिन अब वह गति और तीव्रता नजर नहीं आती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बयान के जरिए उन्होंने परोक्ष रूप से वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं और अपनी उपयोगिता की याद दिलाई है। पार्टी से वफादारी, लेकिन संपर्कों की कमी का दर्द अपनी वर्तमान स्थिति पर चर्चा करते हुए पार्थ ने बताया कि वे आज भी खुद को तृणमूल का हिस्सा मानते हैं, लेकिन केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने उनके संबंधों के ताने-बाने को तोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान मोबाइल जब्त होने से मेरे पास अब पार्टी के कई बड़े मंत्रियों के नंबर तक नहीं हैं। लेकिन कार्यकर्ता ही मेरी असली पूंजी हैं और मैं उनके भरोसे खड़ा हूं। चुनाव लडऩे के सवाल पर उन्होंने पत्ता नहीं खोला और कहा कि समय आने पर ही इस पर फैसला होगा। सरकार की आर्थिक नीति पर भी साधा निशाना हैरानी की बात यह रही कि पार्थ चटर्जी ने न केवल राजनीतिक बल्कि राज्य के बजट पर भी बेबाक राय रखी। उन्होंने टिप्पणी की कि बजट सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया है। हालांकि, उन्होंने विधानसभा की स्टैंडिंग कमेटियों में जगह देने के लिए अध्यक्ष का आभार जताया। जेल से लौटने के बाद पार्थ की यह सक्रियता तृणमूल के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है, खासकर तब जब वे खुद को अब भी ममता बनर्जी का सिपाही बता रहे हैं।