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हाईकोर्ट ने बरकरार रखी सजा
कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि गलतफहमी या धोखे के आधार पर प्राप्त की गई सहमति को कानून की नजर में वैध सहमति नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास की एकल पीठ ने 12 साल पुराने दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत द्वारा दोषी को सुनाई गई सात साल की सजा और जुर्माने को बरकरार रखा है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि आरोपी ने शादी का झूठा वादा न किया होता, तो पीडि़ता कभी शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति नहीं देती। मामला मुर्शिदाबाद जिले के बुरवान थाने का है। साल 2006 में एक विवाहित व्यक्ति ने 20 वर्षीय युवती को अपने जाल में फंसाया। आरोपी ने युवती से वादा किया था कि यदि वह उसे बच्चा देगी, तो वह उससे निकाह कर लेगा। इस झांसे में आकर युवती ने शारीरिक संबंध बनाए और एक बच्चे को जन्म दिया। हालांकि, बच्चे के जन्म के बाद आरोपी अपने वादे से मुकर गया। इसके बाद जनवरी 2014 में त्वरित न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) ने उसे दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी विवाहित था और उसने अपनी हवस मिटाने के लिए एक निरक्षर ग्रामीण लड़की को झूठे वादे से बहलाया-फुसलाया। यह शुरू से ही धोखे का मामला है। आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि चूंकि मुवक्किल मुस्लिम है और उसे दूसरी शादी की अनुमति है, इसलिए विवाहित होना मायने नहीं रखता। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि मुख्य बिंदु शादी का वह झूठा वादा है जिसके आधार पर सहमति ली गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीडि़ता शुरू से ही इस गलतफहमी में थी कि आरोपी उससे शादी करेगा। अत: इसे सहमति से बना संबंध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह सहमति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई थी। समझौते का दावा खारिज आरोपी ने अदालत में यह भी दावा किया था कि बच्चे के जन्म के बाद लड़की का परिवार उससे बड़ी रकम की मांग कर रहा था और इनकार करने पर पुलिस में झूठी शिकायत दर्ज कराई गई।
हालांकि, पीडि़ता के भाई और भाभी की गवाहियों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी के दावों को दरकिनार कर दिया। कोर्ट ने माना कि सामाजिक परिणामों के डर से पीडि़ता ने गर्भावस्था के अंतिम चरण में परिजनों को जानकारी दी थी, जो एक स्वाभाविक मानवीय व्यवहार है।