70 की उम्र में टूटी छत और तन्हाई के बीच होटल चलाकर लिख रहीं स्वावलंबन की इबारत
हावड़ा। सालकिया हरोगंज बाजार की संकरी गलियों में एक छोटी सी जर्जर दुकान है, जिसकी दीवारों पर जमी धुएं की कालिख और टूटी हुई छत एक 70 साल की बुजुर्ग महिला के तीन दशकों के लंबे संघर्ष की गवाही देती है। यह कहानी दीपाली घोष की है, जिन्हें स्थानीय लोग सम्मान से 'दादी' कहकर पुकारते हैं। उम्र के जिस पड़ाव पर लोग अपनों के साथ और आराम की उम्मीद करते हैं, उस उम्र में दीपाली हर सुबह चूल्हा जलाकर समाज के सामने स्वावलंबन और जीवटता की एक अनूठी मिसाल पेश कर रही हैं। दीपाली घोष के जीवन की डगर आसान नहीं रही है। परिवार के नाम पर आज उनका कोई नहीं है, जो उनकी सुध ले सके। पिछले 30 सालों से वह अकेले ही अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही हैं। उनकी छोटी सी दुकान ही उनका संसार है और वही उनका घर भी। इसी धुएं से भरी कालिख लगी दुकान के एक कोने में वह अपना गुजारा करती हैं।
होटल चलाने के लिए वह न केवल खुद खाना पकाती हैं, बल्कि इस उम्र में भारी सामान की खरीदारी के लिए बाजार की दौड़ भी स्वयं लगाती हैं। उनके हाथों की झुर्रियां और झुकती कमर उनके हौसलों के आगे बौनी नजर आती हैं। लॉकडाउन के बाद से दीपाली के इस छोटे से होटल पर नियति की मार और भी गहरी पड़ी है। कभी ग्राहकों से गुलजार रहने वाली इस दुकान में अब दिन भर में बमुश्किल पांच ग्राहक ही आते हैं। इतनी कम कमाई में अपना पेट पालना और दुकान का खर्च निकालना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, लेकिन हार मानना उनके स्वभाव में नहीं है। वह आज भी इसी उम्मीद में चूल्हा सुलगाती हैं कि शायद आज कोई ज्यादा ग्राहक आ जाए। दुकान की जर्जर छत और टपकती दीवारों के बीच उनका यह संघर्ष हावड़ा के स्थानीय लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। दीपाली दादी की यह मर्मस्पर्शी कहानी तब दुनिया के सामने आई जब आराधना चटर्जी नामक एक सोशल मीडिया यूजर ने उनका वीडियो बनाकर इंस्टाग्राम पर साझा किया। वीडियो में दीपाली की आंखों की नमी और उनके काम करने के जज्बे ने हजारों लोगों का दिल पसीने दिया है। आराधना ने इस वीडियो के जरिए लोगों से अपील की है कि वे मिलकर दीपाली की दुकान का 'मेकओवर' करें ताकि वहां ज्यादा ग्राहक आ सकें और दादी को इस उम्र में थोड़ी राहत मिल सके। इस मानवीय पहल के बाद मदद के सैकड़ों हाथ आगे आए हैं और लोग डिजिटल माध्यमों से उनकी लोकेशन और सहायता का तरीका पूछ रहे हैं। सालकिया हरोगंज बाजार के इस छोटे से होटल की कहानी अब केवल एक महिला के जीवनयापन का जरिया नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य के अजेय साहस का प्रतीक बन गई है। दीपाली घोष की कहानी हमें याद दिलाती है कि उम्र और अकेलेपन की बेडिय़ों को मेहनत और संकल्प के जरिए तोड़ा जा सकता है। अब देखना यह है कि समाज की यह सामूहिक सहानुभूति इस बुजुर्ग 'दादी' के जीवन की सांध्य वेला में कितनी रोशनी भर पाती है।