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ममता का 'शहरी कार्ड', राज्यसभा की राह से 2026 की किलेबंदी

वहीं, बाबुल सुप्रियो का चयन एक अनुभवी राजनेता को पुरस्कृत करने और उनके दिल्ली के पुराने अनुभवों को भुनाने की कोशिश है

28 Feb 2026

ममता का 'शहरी कार्ड', राज्यसभा की राह से 2026 की किलेबंदी

कोलकाता। बंगाल की राजनीति में माटी-मानुष का नारा बुलंद करने वाली तृणमूल अब महानगर और मध्यवर्ग की ओर कदम बढ़ाती दिख रही है। राज्यसभा चुनावों के लिए घोषित उम्मीदवारों की हालिया सूची केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस गहरी राजनीतिक बिसात का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2026 के विधानसभा चुनाव हैं। पार्टी ने इस बार अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरणों अल्पसंख्यक, आदिवासी और ग्रामीण प्रतिनिधित्व से इतर एक ऐसी सूची पेश की है जो पूरी तरह से शहरी, शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग को समर्पित नजर आती है। सियासी गलियारों में इस बदलाव को ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की उस सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य हालिया लोकसभा चुनावों और नगर निकाय परिणामों में शहरी क्षेत्रों में लगी सेंध की भरपाई करना है। बंगाल के 76 नगर निकायों में तृणमूल को मिले झटकों ने नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि केवल ग्रामीण जनाधार के भरोसे 2026 की वैतरणी पार करना जोखिम भरा हो सकता है। इस सूची में सबसे चौंकाने वाला और ग्लैमरस नाम अभिनेत्री कोयल मलिक का है। टॉलीवुड की क्वीन मानी जाने वाली कोयल न केवल एक स्थापित अभिनेत्री हैं, बल्कि उनका पारिवारिक कद भी काफी ऊंचा है। उनके पिता रंजीत मलिक की छवि एक साफ-सुथरे और सम्मानित अभिनेता की रही है। कोयल के जरिए ममता बनर्जी बंगाल के उस भद्रलोक और मध्यवर्गीय बंगाली परिवार तक अपनी पहुंच बनाना चाहती हैं, जो अक्सर ग्लैमर के साथ-साथ बौद्धिकता को प्राथमिकता देता है। कोयल की हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला पर समान पकड़ उन्हें दिल्ली के गलियारों में पार्टी का एक प्रभावी चेहरा बनाएगी। 
वहीं, बाबुल सुप्रियो का चयन एक अनुभवी राजनेता को पुरस्कृत करने और उनके दिल्ली के पुराने अनुभवों को भुनाने की कोशिश है। भाजपा से आए बाबुल सुप्रियो के पास केंद्रीय मंत्री और सांसद के रूप में काम करने का लंबा अनुभव है। पार्टी को लगता है कि संसद के उच्च सदन में बाबुल जैसे मुखर नेता की उपस्थिति राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल के पक्ष को मजबूती से रखेगी। प्रशासनिक हल्के से राजीव कुमार की एंट्री ने सबको हैरान कर दिया है। पूर्व डीजीपी राजीव कुमार, जो एक समय मुख्यमंत्री के बेहद करीबी अधिकारियों में गिने जाते थे, बीच में कुछ समय के लिए हाशिए पर नजर आए थे लेकिन उन्हें राज्यसभा भेजकर ममता ने दो टूक संदेश दिया है कि वे अपने वफादारों के साथ खड़ी रहती हैं। राजीव कुमार का चयन न केवल उन्हें राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पार्टी को उनकी रणनीतिक और प्रशासनिक समझ पर अब भी पूरा भरोसा है। राष्ट्रीय राजधानी की एलीट राजनीति में पैठ बनाने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी का नाम एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। अब तक तृणमूल दिल्ली में कपिल सिब्बल जैसे बाहरी दिग्गजों पर निर्भर रहती थी, लेकिन मेनका के जरिए ममता बनर्जी ने खुद का एक ऐसा चेहरा तैयार किया है जो दिल्ली के बौद्धिक, कानूनी और रसूखदार तबके में गहरी पैठ रखता है। 
इंडिया गठबंधन में अपनी भूमिका को विस्तार देने के लिए ममता को एक ऐसे सेतु की आवश्यकता थी जो दिल्ली के प्रभावशली समाज की भाषा बोल सके। कुल मिलाकर, तृणमूल की यह नई टीम बंगाल के शहरों में पनप रही नाराजगी को कम करने और एक प्रोग्रेसिव छवि गढऩे की कोशिश है। यदि यह दांव सफल रहता है, तो 2026 में भाजपा के शहरी वोट बैंक में सेंध लगाना ममता के लिए आसान हो जाएगा। 

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