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'सुंदरी' के कवच से ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की जंग शुरू
कोलकाता। बंगाल के ग्रामीण अंचलों में तबाही मचाने वाला नदी कटाव अब देश की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता के द्वार तक आ पहुँचा है। हुगली नदी के तट पर बसे महानगर के उत्तरी और मध्य हिस्सों पर कटाव का खतरा इस कदर मंडरा रहा है कि विशेषज्ञों ने स्ट्रैंड रोड जैसी लाइफलाइन और सदियों पुराने घाटों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विशेषज्ञों की चेतावनी के बाद कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने अब एक महात्वाकांक्षी ग्रीन वॉल परियोजना पर काम शुरू किया है, जिसके तहत मैंग्रोव प्रजाति के सुंदरी पेड़ों के जरिए हुगली की विनाशकारी लहरों को रोकने की तैयारी है। नदी विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के एक बड़े वर्ग ने नगर निगम को सौंपी अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, हावड़ा की ओर वर्षों से नदी के तल में भारी मात्रा में गाद (पली) जमा हो गई है, जिससे नदी का प्राकृतिक ढाल और गहराई प्रभावित हुई है। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि हुगली का मुख्य प्रवाह अब कोलकाता के किनारों की ओर विस्थापित हो गया है। नदी की प्रचंड जलधारा अब काशीपुर, बागबाजार और प्रिंसेप घाट के तटबंधों से सीधे टकरा रही है, जिससे मिट्टी का धंसना और कटाव एक स्थायी समस्या बन गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गाद निकालने (ड्रेजिंग) और किनारों को मजबूती देने का काम युद्धस्तर पर नहीं हुआ, तो आने वाले दशकों में मानचित्र से कई महत्वपूर्ण इलाके गायब हो सकते हैं। यह संकट केवल मिट्टी बहने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोलकाता की आत्मा पर प्रहार है। हुगली के इन किनारों पर कुम्हारटोली की विश्वप्रसिद्ध मूर्तिकला, शोभाबाजार और बागबाजार की ऐतिहासिक हवेलियाँ, और बड़ाबाजार-पोस्टा जैसे एशिया के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र स्थित हैं। निमतला और काशी मित्र घाट जैसे श्मशान घाट, जहाँ महान विभूतियों का अंतिम संस्कार हुआ, वे भी अब खतरे की जद में हैं। प्रिंसेप घाट की वह विरासत, जो कोलकाता की पहचान है, उसके नीचे की जमीन धीरे-धीरे खोखली हो रही है। यदि कटाव का यह सिलसिला जारी रहा, तो महानगर की ये ऐतिहासिक धरोहरें जलमग्न हो सकती हैं। इस प्राकृतिक चुनौती का सामना करने के लिए मेयर फिरहाद हकीम और मेयर परिषद सदस्य (उद्यान) देवाशीष कुमार ने नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन (प्रकृति आधारित समाधान) को अपनाया है। कंक्रीट के कृत्रिम बांधों की विफलता को देखते हुए नगर निगम अब मैंग्रोव की प्रजातियों, विशेषकर सुंदरी, बाइन और केओरा के पौधों पर दांव लगा रहा है। प्रिंसेप घाट से विद्यासागर सेतु तक करीब 2300 मैंग्रोव पौधे लगाए जा चुके हैं।
इन पेड़ों की विशेषता यह है कि इनकी जड़ें मिट्टी के भीतर एक जाल की तरह फैल जाती हैं, जो किनारों को सीमेंट की तरह जकड़ लेती हैं। नदी के पानी के सीधे प्रहार को कम करने के लिए 750 वेटिवर घास की नर्सरी तैयार की गई है। यह घास एक प्राकृतिक फिल्टर और बांध की तरह काम करती है। सुरक्षा घेरे को अतिरिक्त मजबूती देने के लिए गंगाबर्धन प्रजाति के 350 नारियल के पेड़ भी लगाए गए हैं, जो अपनी गहरी जड़ों के लिए जाने जाते हैं। मेयर फिरहाद हकीम ने स्पष्ट किया है कि केवल वृक्षारोपण पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने सिंचाई विभाग और पोर्ट ट्रस्ट के अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय वार्ता का संकेत दिया है ताकि हावड़ा की ओर जमा गाद को निकाला जा सके। जब तक नदी के बीच का रास्ता साफ नहीं होगा, तब तक कोलकाता की ओर बढ़ता जल का दबाव कम नहीं होगा। कोलकाता नगर निगम की यह मुहिम अब एक जन-आंदोलन का रूप लेती दिख रही है, जहाँ पर्यावरण सुरक्षा और विरासत संरक्षण एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं।