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बंगाल की पहचान मिटाने की हो रही साजिश
कोलकाता। चुनावी समर में अब भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति ने निर्णायक मोड़ ले लिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांथी में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए तृणमूल पर तीखा हमला बोला और बंगाल की अस्मिता को खतरे में बताया। योगी ने कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के पुराने उर्दू विवाद को फिर से हवा देते हुए आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल बंगाल की गौरवशाली विरासत और बांग्ला भाषा को हाशिए पर धकेलने की सुनियोजित कोशिश कर रहा है। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए कहा कि बंगाल की धरती पर बांग्ला का अपमान किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में फिरहाद हकीम के उस चर्चित बयान का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर बंगाल के एक बड़े हिस्से के उर्दू बोलने की बात कही थी। योगी ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि जो लोग बंगाल में रहकर बांग्ला के बजाय उर्दू थोपना चाहते हैं, वे दरअसल बंगाली संस्कृति को मिटाना चाहते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जिन्हें उर्दू से इतना ही लगाव है, उन्हें वहीं चले जाना चाहिए जहाँ यह भाषा मुख्य रूप से बोली जाती है। योगी के इस बयान ने राज्य में भाषाई गौरव बनाम तुष्टीकरण की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है, जिससे चुनावी तपिश अचानक बढ़ गई है। यह विवाद दरअसल साल 2024 में फिरहाद हाकिम के उस विवादास्पद बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ऊपरवाले के आशीर्वाद से एक दिन अल्पसंख्यक बहुसंख्यक बनेंगे। हालांकि उस समय खुद तृणमूल कांग्रेस ने इस बयान से पल्ला झाड़ लिया था और इसे हाकिम का निजी विचार बताते हुए पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग करार दिया था। टीएमसी ने तब स्पष्ट किया था कि पार्टी सांप्रदायिक सौहार्द और भाषाई एकता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
बावजूद इसके, भाजपा अब इस मुद्दे को भुनाकर तृणमूल को बंगाली विरोधी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में चित्रित करने की पूरी कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तर्ज पर योगी आदित्यनाथ ने भी बंगाल के सांस्कृतिक गौरव को चुनावी मुद्दा बनाया है। भाजपा की रणनीति साफ है कि वह विकास के मुद्दों के साथ-साथ बंगाली अस्मिता और हिंदुत्व के मिश्रण से मतदाताओं को साधने की कोशिश में है।
योगी के इस प्रहार के बाद तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग और तेज होने के आसार हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाषा और पहचान की यह लड़ाई बंगाल की सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने में किस दल के लिए मददगार साबित होती है।