तारातला में निर्माणाधीन गोदाम की छत ढही, 3 मजदूरों की मौत, 18 को बचाया गया
राहुल का ममता को साथ, तो अधीर का 'प्रलाप' वाला वार
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल तृणमूल कांग्रेस, बल्कि कांग्रेस के भीतर के अंतर्विरोधों को भी सतह पर ला दिया है। एक ओर जहां कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की हार को लोकतंत्र के बड़े सवालों से जोड़ते हुए उनके प्रति नरम और सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया है, वहीं बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने अपनी ही पार्टी की लाइन से अलग जाकर ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है। बहरामपुर स्थित जिला कार्यालय से अधीर का यह तेवर साफ संकेत दे रहा है कि बंगाल की जमीन पर कांग्रेस और तृणमूल के बीच की बर्फ पिघलना फिलहाल नामुमकिन है।
अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे और इस्तीफा न देने की बात कही थी। अधीर ने तंज कसते हुए कहा कि यह पूरी तरह से राजनीतिक नाटकबाजी है। एक तरफ आप कह रही हैं कि आपको गलत तरीके से हराया गया और आप इस्तीफा नहीं देंगी, वहीं दूसरी तरफ आप विपक्षी नेता की तलाश कर रही हैं। अगर तृणमूल को वाकई लगता है कि चुनाव अनैतिक था या जनादेश की चोरी हुई है, तो उन्हें पूरे चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए था।
ममता बनर्जी द्वारा चुनाव में धांधली के आरोपों पर अधीर ने उन्हें आईना दिखाते हुए कहा कि वह खुद एक वकील हैं और उन्हें सड़क पर नाटक करने के बजाय अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। उन्होंने ममता के सत्ता में बने रहने के दावों को प्रलाप करार देते हुए कहा कि हार स्वीकार करने के बजाय इस तरह की बयानबाजी जनता के साथ मजाक है। अधीर का यह हमला उस वक्त आया है जब राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि तृणमूल की हार पर कोई जश्न न मनाया जाए और इसे लोकतांत्रिक विफलता के तौर पर देखा जाए।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अधीर रंजन चौधरी और राहुल गांधी के बयानों में यह विरोधाभास कांग्रेस के लिए भविष्य में मुश्किलें पैदा कर सकता है। दिल्ली में बैठा केंद्रीय नेतृत्व भाजपा के खिलाफ ममता बनर्जी को एक जरूरी सहयोगी के रूप में देखता है, लेकिन बंगाल की प्रदेश इकाई के लिए ममता आज भी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं।
ममता बनर्जी की हार के बाद राज्य में जो नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं, उनमें अधीर रंजन चौधरी का कड़ा रुख यह बताता है कि बंगाल कांग्रेस अपनी अलग पहचान और तृणमूल विरोधी छवि को छोडऩे के मूड में नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अधीर के इन बाग़ी तेवरों पर लगाम लगाएगा या बंगाल में दो राहों पर चलने की यह परंपरा जारी रहेगी?