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कसबा और तपसिया में अवैध निर्माण ढहाने के नोटिस को अदालत में चुनौती
कोलकाता। बंगाल की नई सरकार द्वारा अवैध निर्माणों के खिलाफ शुरू की गई जीरो टॉलरेंस नीति और ताबड़तोड़ ध्वस्तीकरण अभियान को हाईकोर्ट से पहला बड़ा झटका लगा है। कोलकाता के कसबा और तपसिया इलाके में नगर निगम द्वारा जारी किए गए डिमोलिशन नोटिस को चुनौती देते हुए स्थानीय निवासियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। मंगलवार को चार अलग-अलग इमारतों में रहने वाले करीब 100 लोगों ने इस मामले में तत्काल दखल देने की अपील की, जिसे स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन ने निवासियों को बकायदा रिट याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई आगामी शुक्रवार को होने की उम्मीद है।
अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील फिरदौस शमीम ने नगर निगम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बेंच को बताया कि जिन इमारतों को अवैध बताकर तोडऩे का नोटिस थमाया गया है, उनमें से एक भवन साल 1992 (लगभग 34 साल पुराना) से जस का तस मौजूद है। इतने दशकों पुराने और स्थापित निर्माण को भी बिना किसी गहन जांच-पड़ताल के अचानक ध्वस्तीकरण की सूची में डाल दिया गया, जिससे वहां रह रहे दर्जनों परिवारों के सिर से छत छिनने का खतरा पैदा हो गया है। निवासियों का आरोप है कि नए नियमों की आड़ में बिना सोचे-समझे ताबड़तोड़ कार्रवाई की जा रही है।
दरअसल, सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कड़े तेवरों को देखते हुए कोलकाता नगर निगम ने शहर के विभिन्न हिस्सों में नियमों को ताक पर रखकर बनीं इमारतों को चिन्हित करना शुरू किया था। इसी के तहत तिलजला, कसबा और बेलियाघाटा जैसे संवेदनशील इलाकों में धड़ल्ले से चल रहे अवैध निर्माणों को कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 400(1) के तहत नोटिस भेजे गए थे। यह धारा नगर आयुक्त को किसी भी अवैध या नक्शे के विपरीत बने निर्माण को गिराने का पूरा अधिकार देती है।
इस पूरे अभियान के दौरान सबसे बड़ी चर्चा यह है कि जिन बहुमंजिला इमारतों पर केएमसी ने बुलडोजर चलाना शुरू किया है, उनके तार सीधे पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार के कद्दावर नेताओं, पार्षदों और बोरो चेयरमैनों से जुड़े हैं। बेलियाघाटा में एक बड़े अवैध निर्माण के पीछे स्थानीय तृणमूल नेता राजू नस्कर का नाम खुलकर सामने आ रहा है, जबकि दो अन्य मामलों में सिंडिकेट और प्रमोटरों के साथ स्थानीय पार्षदों की साठगांठ की बातें हवा में हैं। नगर निगम के सूत्रों के मुताबिक, प्रमोटरों ने जिन जमीनों पर महज दो या तीन मंजिला इमारत बनाने की सीमित मंजूरी ली थी, वहां पैसे और रसूख के दम पर पांच से छह मंजिला ऊंची इमारतें तान दी गईं। कई जगहों पर तो दो अलग-अलग ब्लॉकों को अवैध रूप से जोड़कर बड़ी-बड़ी कमर्शियल और रिपेयरिंग यूनिट्स खड़ी की जा रही थीं। रविवार से शुरू हुए इस महा-डिमोलिशन अभियान के दौरान भारी जन-आक्रोश और झड़प की आशंका को देखते हुए केएमसी की टीम के साथ भारी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था।
इधर, बढ़ते विवाद और कानूनी लड़ाई के बीच कोलकाता नगर निगम के आला अधिकारियों ने सफाई दी है कि केएमसी केवल उन्हीं हिस्सों पर हथौड़ा चला रही है जो पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं और जिनका कोई स्वीकृत नक्शा नहीं है; किसी भी वैध या कानूनी निर्माण को छूने का निगम का कोई इरादा नहीं है। बहरहाल, अब जब यह पूरा मामला कलकत्ता हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है, तो शुक्रवार को होने वाली सुनवाई पर पूरे कोलकाता के प्रमोटरों, सिंडिकेट संचालकों और प्रभावित निवासियों की नजरें टिक गई हैं।