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ममता की आपात बैठक बेनतीजा, रद्द हुई कालीघाट की मीटिंग
कोलकाता। बंगाल की राजनीति में बीते चौबीस घंटों के भीतर हुए दो बड़े हमलों ने सत्तारूढ़ दल तृणमूल के भीतर जिस खौफ, बेचैनी और असंतोष की स्थिति को जन्म दिया था, उसका सबसे बड़ा और हैरान करने वाला असर रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर देखने को मिला। शनिवार को सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी के साथ हुई कथित बदसुलूकी और रविवार को हुगली में वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए जानलेवा पथराव के बाद पार्टी विधायकों में पैदा हुई असुरक्षा की भावना इस कदर हावी रही कि मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई आपातकालीन बैठक पूरी तरह से बेनतीजा और विफल साबित हुई। रविवार शाम चार बजे कालीघाट स्थित ममता आवास पर पार्टी के विजयी विधायकों की यह बेहद महत्वपूर्ण सांगठनिक बैठक शुरू तो हुई, लेकिन विधायकों की भारी अनुपस्थिति और नदारद चेहरों को देखकर इसे तुरंत ही रद्द घोषित कर दिया गया।
इस सांगठनिक बैठक के रद्द होने के पीछे टीएमसी विधायकों के भीतर जनता के आक्रोश को लेकर गहरा असमंजस और डर साफ देखा गया। कई विधायकों के बीच सुबह से ही यह चर्चा चलती रही कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में खुलकर सामने आना या कालीघाट तक की यात्रा करना भारी जोखिम भरा हो सकता है। विधायकों को डर था कि जिस तरह शीर्ष नेतृत्व और कद्दावर सांसदों को सड़कों पर जनता के तीखे विरोध और गुस्से का सामना करना पड़ रहा है, वैसे ही हालात उनके साथ भी बन सकते हैं। एक विधायक ने तो स्पष्ट तौर पर कह दिया था कि माहौल इस कदर बिगड़ चुका है कि कालीघाट पहुंचने से पहले ही रास्ते में जनता के गुस्से का शिकार होकर सीधे अस्पताल पहुंचना पड़ सकता है। इसी खौफ का नतीजा रहा कि जब शाम चार बजे बैठक का समय हुआ, तो हॉल में सन्नाटा पसरा दिखाई दिया, जिसके तुरंत बाद नेतृत्व ने बैठक को आनन-फानन में रद्द करने का फैसला लिया।
इस बैठक में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राज्य के दूर-दराज के जिलों को तो छोडि़ए, खुद कोलकाता और उसके आसपास के कई कद्दावर विधायक भी इस अहम बैठक से पूरी तरह नदारद रहे। कोलकाता और दक्षिण 24 परगना के मजबूत गढ़ माने जाने वाले इलाकों के जनप्रतिनिधियों ने भी इस बैठक से दूरी बनाना ही बेहतर समझा। अनुपस्थित रहने वाले प्रमुख चेहरों में टीएमसी के वरिष्ठ नेता और विधायक जावेद अहमद खान का नाम सबसे ऊपर चर्चा में रहा। जावेद अहमद खान जैसे अनुभवी और कद्दावर कोलकाता के विधायक का बैठक में न पहुंचना पार्टी नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। उनके अलावा हावड़ा, हुगली और उत्तर 24 परगना जैसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील जिलों के दर्जनों विधायकों ने पहले ही मन बना लिया था कि वे इस माहौल में बैठक का हिस्सा नहीं बनेंगे और वे शाम चार बजे तक कालीघाट नहीं पहुंचे।
पार्टी के भीतर केवल डर ही नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीतियों के खिलाफ गंभीर असंतोष भी इस बैठक के रद्द होने का मुख्य कारण बना। नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के कुछ विधायकों ने वर्तमान हालात पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए कहीं न कहीं वे खुद भी जिम्मेदार हैं और बंगाल में पार्टी की वर्तमान दुर्दशा के पीछे उनके फैसलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी तरह, कुछ अन्य विधायकों का मानना था कि सांसद कल्याण बनर्जी लंबे समय से जिस तरह की आक्रामक और विवादास्पद भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं, आज जनता का हिंसक आक्रोश उसी का परिणाम है। ऐसे में कई विधायक खुलकर यह कहने लगे हैं कि वे किसी खास नेता के पीछे व्यक्तिगत निष्ठा दिखाने या व्यक्तिपूजा की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अपनी सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाएंगे।
वर्तमान विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के पास 80 विधायक हैं, लेकिन सीआईडी द्वारा कथित हस्ताक्षर जालसाजी मामले में कई विधायकों को भेजे गए नोटिस और चौतरफा सियासी दबाव के कारण ज्यादातर नेताओं ने इस समय लो-प्रोफाइल रहने की रणनीति अपनाई है। जब 4 बजे की बैठक शुरू होते ही रद्द कर दी गई, तो राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुष्टि हो गई कि पार्टी के भीतर सांगठनिक दरार बहुत गहरी हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोलकाता के विधायकों और जावेद अहमद खान जैसे वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति के कारण बैठक का रद्द होना यह साफ संकेत देता है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व के प्रति भरोसा पूरी तरह डगमगा चुका है और आने वाले दिनों में बंगाल की सत्ताधारी पार्टी में एक बड़ा और औपचारिक बिखराव देखने को मिल सकता है।