मलबे में तब्दील हुईं सैकड़ों झुग्गियां और दुकानें, छा गया सन्नाटा
हावड़ा। टिकियापाड़ा इलाके में मंगलवार की सुबह उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब रेलवे प्रशासन ने भारी सुरक्षा बलों के साथ मिलकर एक बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू किया। दक्षिण-पूर्व रेलवे की जमीन पर दशकों से पैर पसारे बैठीं झुग्गी-झोपडिय़ों और अस्थायी दुकानों को बुलडोजर चलाकर पूरी तरह से जमींदोज कर दिया गया। इस बड़ी कार्रवाई के दौरान पूरे इलाके को पुलिस, आरपीएफ और केंद्रीय सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी में छावनी के रूप में तब्दील कर दिया गया था। देखते ही देखते कुछ ही घंटों के भीतर पूरा इलाका मलबे के ढेर में बदल गया और करीब सौ से अधिक गरीब परिवारों के सिर से आशियाना छिन गया।
रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, टिकियापाड़ा से हावड़ा स्टेशन की तरफ जाने वाली मुख्य रेल लाइन के किनारे रेलवे की बड़ी मात्रा में बेशकीमती जमीन है। इस जमीन पर लंबे समय से अवैध रूप से कब्जा कर बड़ी संख्या में झुग्गियां बना ली गई थीं और उनके साथ-साथ कई छोटी-बड़ी व्यावसायिक दुकानें भी चलाई जा रही थीं। रेलवे प्रशासन का दावा है कि इन अतिक्रमणकारियों को पहले भी कई बार कानूनी नोटिस जारी कर स्वेच्छा से जमीन खाली करने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन बार-बार की पैमाइश और मुनादी के बावजूद किसी ने भी जगह को खाली नहीं किया, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाना अनिवार्य हो गया।
मंगलवार तड़के ही रेलवे प्रशासन ने उच्छेद अभियान की पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी। किसी भी संभावित विरोध से निपटने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल और आरपीएफ के जवानों ने मोर्चा संभाल लिया। बुलडोजर चलने से पहले प्रशासन की ओर से लाउडस्पीकर के जरिए आखिरी बार लोगों को क्षेत्र खाली करने की अंतिम चेतावनी दी गई। लोगों को अपने कीमती सामान और आशियाने खुद हटाने के लिए थोड़ा वक्त भी दिया गया, लेकिन जब अधिकांश परिवारों ने जगह नहीं छोड़ी, तब रेल प्रशासन ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए बुलडोजरों को आगे बढ़ा दिया।
भारी सुरक्षा घेरे के कारण मौके पर किसी बड़े विरोध या अप्रिय घटना की स्थिति पैदा नहीं हो सकी और बाहरी तत्वों की आवाजाही को भी पूरी तरह नियंत्रित रखा गया। इस कार्रवाई के पीछे रेलवे ने सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की गंभीर जरूरतों का हवाला दिया है। अधिकारियों के अनुसार, रेल लाइन के बिल्कुल सटीक सटकर एक बड़ा नाला गुजरता है, जिसके ऊपर और आसपास अवैध झुग्गियां बन जाने की वजह से मानसून के दौरान नाले की सफाई का काम पूरी तरह ठप हो जाता था। इसके चलते जल निकासी बाधित होती थी और भारी बारिश में रेल पटरियां डूब जाती थीं, जिससे ट्रेनों के परिचालन पर गंभीर संकट मंडराने लगता था। आगामी मानसून को देखते हुए रेल यातायात को सुचारू रखने के लिए यह अभियान बेहद जरूरी हो गया था।
गौरतलब है कि हाल के महीनों में रेलवे ने हावड़ा और सियालदह जैसे बड़े स्टेशनों के अलावा दमदम, हाबड़ा और जादवपुर में भी इसी तरह के कड़े अभियान चलाए हैं, लेकिन अब तक की ज्यादातर कार्रवाइयां केवल फुटपाथी दुकानों और हॉकरों तक ही सीमित थीं। टिकियापाड़ा में हुई यह कार्रवाई रिहायशी झुग्गियों को हटाने के मामले में अब तक की सबसे बड़ी और व्यापक कार्रवाई मानी जा रही है।
दूसरी तरफ, इस अचानक हुई कार्रवाई से विस्थापित हुए प्रभावित परिवारों में भारी आक्रोश और मायूसी का माहौल है। मलबे के पास बैठी रोती-बिलखती महिलाओं और बुजुर्गों का कहना है कि वे पीढिय़ों से इस जगह पर रह रहे थे और प्रशासन ने बिना किसी स्पष्ट पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें अचानक बेघर कर दिया है। सिर से छत और हाथ से रोजी-रोटी छिन जाने के बाद इन परिवारों के सामने अब जीवन यापन का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां रेलवे अपनी इस कार्रवाई को पूरी तरह कानूनी और ढांचागत सुधार के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं दूसरी ओर विस्थापितों का दर्द अब इलाके में एक नई सामाजिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे रहा है।