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चूड़का मुर्मू... पाकिस्तान से युद्ध के गुमनाम नायक, जिन्हें आज तक नहीं मिली सरकारी मान्यता

कश्मीर के पहलगाम में इस्लामिक आतंकवादियों के हमले में 26 नागरिकों के मारे जाने के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव चरम पर है

06 May 2025

चूड़का मुर्मू... पाकिस्तान से युद्ध के गुमनाम नायक, जिन्हें आज तक नहीं मिली सरकारी मान्यता

कश्मीर के पहलगाम में इस्लामिक आतंकवादियों के हमले में 26 नागरिकों के मारे जाने के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव चरम पर है। ऐसे समय में देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीरों को याद करना और भी जरूरी हो जाता है। चलिए आज हम एक ऐसे गुमनाम देशभक्त बलिदानी के बारे में आपको बताते हैं, जिन्होंने आज से करीब 54‌ साल पहले 1971 में इसी पाकिस्तान सेना का न केवल डटकर मुकाबला किया, बल्कि अपने साहस से हमेशा के लिए अमर हो गए। ये गुमनाम लेकिन प्रेरणादायक नाम है – चूड़का मुर्मू।चूड़का मुर्मू वह साहसी युवक था जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती चाक रामप्रसाद गांव में पाकिस्तानी सेना से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की। 2 जुलाई 1951 को तत्कालीन पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चक्रमप्रसाद गांव में संथाल जनजाति में जन्मे चुड़का मुर्मू तब महज 20 साल के थे और एक एक होनहार छात्र थे। लेकिन जब गांव पर खतरा मंडराने लगा, तो वह अपने कंधों पर देशभक्ति का दायित्व लेकर आगे बढ़ गए।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख रहे अद्वैतचरण दत्त अपनी किताब "अमर शहीद चुड़का मुर्मू" में लिखते हैं, "18 अगस्त 1971 को तड़के ‌ 4:30 बजे लगभग 60 70 पाकिस्तानी सैनिक 'मुक्ति बहिनी' का भेष धारण कर चाक रामप्रसाद गांव में घुस आई और बीएसएफ कैंप पर हमला कर दिया। गांव में हड़कंप मच गया, लोग जान बचाकर भागने लगे। लेकिन युवा चूड़का डटा रहा। उसने न केवल गांववालों को चेताया, बल्कि बीएसएफ को भी समय रहते जानकारी दी। तब वहां बीएसएफ के जवानों की संख्या सिर्फ चार थी। जब जवानों को गोला-बारूद ढोने में मदद की जरूरत पड़ी, तो चूड़का ने दो दोस्तों के साथ खुद को इस काम में झोंक दिया।जब पाकिस्तानी सेना ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, तो उसके साथी भाग निकले और बीएसएफ जवान ने हथियार डाल दिए। लेकिन चूड़का न भागा, न झुका। वह गोला-बारूद लेकर रेंगता हुआ खेतों के बीच पहुंचा और एक-एक कर उन्हें पास के तालाब में फेंकने लगा, ताकि दुश्मनों के हाथ न लगें। अंतिम बॉक्स फेंकते समय वह तालाब में गिर पड़ा, और तभी पाकिस्तानी गोलियों का शिकार बन गया। देश ने युद्ध जीता, बांग्लादेश को आजादी मिली, लेकिन चूड़का मुर्मू ने अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।अद्वैत चरण दत्त अपनी किताब में लिखते हैं कि जब पाकिस्तानी सैनिकों ने गांव में घुसकर हमले शुरू किया तो बाकी गांव वालों के साथ चूड़का के गुरु हरेन चक्रवर्ती भी वहां से भागने वाले थे। लेकिन तभी चूड़का ने उन्हें रोकते हुए कहा, "मास्टर सब क्या आप भी भागेंगे?" अपने छात्र की ये दृढ़ता और साहस देखकर गुरु चौंक उठे थे और गर्व से भर गए थे।"वर्ष 1982 से ‘चूड़का मुर्मू स्मृति समिति’ हर साल ‘चूड़का मुर्मू आत्म बलिदान दिवस’ मनाती है। इस अवसर पर कबड्डी और तीरंदाजी प्रतियोगिताओं के साथ-साथ मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देकर नई पीढ़ी में देशभक्ति की भावना जगाई जाती है। वर्ष 2016 में एक ऐतिहासिक पल देखने को मिला, जब पहली बार किसी केंद्रीय मंत्री एसएस अहलूवालिया (केंद्रीय कृषि और संसदीय कार्य राज्य मंत्री) ने गांव पहुंचकर शहीद चूड़का मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

स्वयंसेवक चूड़का मुर्मू अद्वैत चरण दत्त अपनी किताब में लिखते हैं कि देश के लिए पाकिस्तानी सेना से भिड़ जाने वाले चूड़का मुर्मू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक थे। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया है कि शायद इसी वजह से उनके बलिदान को आज तक सरकारी पहचान नहीं मिल पाई है। किताब के जरिए उन्होंने लिखा है कि चूड़का के बलिदान की गाथा इतिहास के पन्नों में दर्ज है किंतु सरकारी अभिलेखों में नहीं। हम मांग करते हैं कि सरकार अभिलंब उन्हें उचित सम्मान प्रदान करे। दरअसल संघ की शाखाओं से मिले संस्कारों ने चूड़का को देश के लिए मर-मिटने का साहस दिया। आज जब देश एक बार फिर सीमा पर तनाव के दौर से गुजर रहा है, चूड़का मुर्मू का बलिदान हमें याद दिलाता है कि देशभक्ति किसी वर्दी की मोहताज नहीं होती। एक आम युवक भी असाधारण वीरता का परिचय देकर इतिहास रच सकता है।
 

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