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जादवपुर विश्वविद्यालय में पुराने नियमों से चुनाव पर विवाद, अधिसूचना रद्द करने की मांग

संगठन का कहना है कि जब मूल अधिनियम में संशोधन हो जाता है, तो उससे असंगत पुराने नियम “कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं” रहते

28 Feb 2026

जादवपुर विश्वविद्यालय में पुराने नियमों से चुनाव पर विवाद, अधिसूचना रद्द करने की मांग

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय शिक्षकों के एक संगठन ने शनिवार को जादवपुर विश्वविद्यालय में प्रतिनिधि निकायों के चुनाव संबंधी अधिसूचना को रद्द करने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि यह प्रक्रिया “अप्रचलित और कानूनी रूप से असंगत” प्रावधानों के तहत शुरू की गई है।
ऑल बंगाल यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (एब्यूटा) की जादवपुर विश्वविद्यालय इकाई ने कहा कि चुनाव जादवपुर यूनिवर्सिटी के जादवपुर विश्वविद्यालय चुनाव उपविधि, 1982 के तहत घोषित किए गए हैं, जो कि मूल जादवपुर यूनिवर्सिटी, 1981 में किए गए संशोधनों के अनुरूप नहीं हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
मामले की व्याख्या करते हुए एब्यूटा की राज्य समिति के सदस्य गौतम मायती ने कहा कि राज्य सरकार ने एक दशक से अधिक समय पहले विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन कर सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्थाओं—जैसे कोर्ट, कार्यकारी परिषद और संकाय परिषदों की संरचना एवं गठन में परिवर्तन किया था। हालांकि, इन परिवर्तनों के अनुरूप चुनाव संबंधी नियमों को औपचारिक रूप से अपडेट नहीं किया गया।
संगठन का कहना है कि जब मूल अधिनियम में संशोधन हो जाता है, तो उससे असंगत पुराने नियम “कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं” रहते।
वामपंथी शिक्षक संगठन ने कहा कि संशोधित अधिनियम से मेल न खाने वाली अप्रचलित उपविधियों के तहत चुनाव कराना पूरी प्रक्रिया को मनमाना और कानूनी रूप से संदिग्ध बनाता है।
एब्यूटा ने तर्क दिया कि 1982 की उपविधियों के अनुसार भी चुनाव दो चरणों में होने थे—पहले निर्वाचित, नामित और पदेन सदस्यों के साथ कोर्ट और संकाय परिषदों का गठन, और उसके बाद उन्हीं निकायों में से कार्यकारी परिषद के सदस्यों का चुनाव।
संगठन का आरोप है कि वर्तमान अधिसूचना “इस निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार करती है और मुख्य रूप से शिक्षकों के निर्वाचन क्षेत्रों तक प्रक्रिया को सीमित कर देती है, ताकि कोर्ट और कार्यकारी परिषद में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।”
एब्यूटा ने यह भी कहा कि वर्ष 2012 के संशोधन के तहत अंतर्विषयक अध्ययन, विधि और प्रबंधन के लिए नई संकाय परिषदों का प्रावधान किया गया था, जिनका 1982 की उपविधियों में कोई उल्लेख नहीं है। इससे पुरानी चुनाव उपविधियां वर्तमान संस्थागत ढांचे के साथ “असंगत” हो जाती हैं।
संगठन ने इस कदम को “अल्ट्रा वायर्स” बताते हुए चेतावनी दी कि ऐसे चुनावों के माध्यम से गठित कोई भी प्राधिकरण कानूनी चुनौती और संस्थागत अस्थिरता का सामना कर सकता है।
शिक्षक संगठन ने विश्वविद्यालय से मांग की है कि संशोधित अधिनियम के अनुरूप नई उपविधियों को अंतिम रूप देकर उन्हें अनुमोदित किया जाए और उसके बाद पारदर्शी तथा विधिसम्मत तरीके से नए सिरे से चुनाव कराए जाएं।
 

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संगठन का कहना है कि जब मूल अधिनियम में संशोधन हो जाता है, तो उससे असंगत पुराने नियम “कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं” रहते





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