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सियासत की सीढिय़ों पर सिस्टम की सेंध

हावड़ा में 'श्रद्धा' से 'वसूली' तक का शर्मनाक सफर

15 Mar 2026

सियासत की सीढिय़ों पर सिस्टम की सेंध

कोलकाता। राजनीति में रैलियां केवल शक्ति प्रदर्शन का जरिया नहीं होतीं, बल्कि ये उन हजारों-लाखों आम नागरिकों की उम्मीदों और भरोसे का प्रतिबिंब होती हैं जो मीलों का सफर तय कर अपने नेता को सुनने आते हैं। 
रविवार को ब्रिगेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुंकार सुनने पहुंचे समर्थकों के साथ हावड़ा स्टेशन पर जो हुआ, उसने न केवल रेलवे की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए, बल्कि मानवता को भी शर्मसार कर दिया। दूर-दराज के गांवों से झोला टांगे, आंखों में उत्साह लिए पहुंचे इन कार्यकर्ताओं को क्या मालूम था कि जिस स्टेशन को वे सार्वजनिक सेवा का केंद्र समझते हैं, वहां की बुनियादी जरूरतें भी किसी लूट तंत्र के अधीन होंगी। हावड़ा स्टेशन के सुलभ शौचालयों में जिस तरह से भाजपा कार्यकर्ताओं से अवैध वसूली की गई, वह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि उस गरीब आदमी की विवशता का उपहास है जो अपनी जेब में गिने-चुने रुपये लेकर लोकतंत्र के उत्सव में शामिल होने आया था। रविवार की सुबह जब धूप खिली और समर्थकों का हुजूम स्टेशन से बाहर निकलने लगा, तो प्राकृतिक जरूरतों के लिए शौचालयों की ओर कदम बढ़ाते ही उन्हें निजी एजेंसियों की दबंगई का सामना करना पड़ा। जहां नियम के मुताबिक चंद सिक्के लगने चाहिए थे, वहां प्रति व्यक्ति 40 रुपये तक की मांग की गई। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार स्वच्छ भारत और सुलभ सुविधा का ढिंढोरा पीटती है। मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो यह दृश्य अत्यंत पीड़ादायक था। कई बुजुर्ग कार्यकर्ता, जो शायद कड़ी धूप में घंटों सफर कर पहुंचे थे, शौचालय के बाहर खड़ा होकर अपनी जेब टटोल रहे थे। 40 और 10 रुपये की यह अवैध मांग उन लोगों के लिए पहाड़ जैसी थी जो मजदूरी छोड़कर या अपनी जमापूंजी का एक हिस्सा लेकर निकले थे। जब इन निश्छल कार्यकर्ताओं ने विरोध किया, तो सेवा के नाम पर बैठी निजी एजेंसी के कारिंदों ने बदसलूकी की सीमा पार कर दी। यह रेलवे प्रशासन की उस कार्यप्रणाली पर गहरा प्रहार है जहां ठेके तो दे दिए जाते हैं, लेकिन उन पर निगरानी का कोई तंत्र विकसित नहीं होता। आखिर किसके शह पर ये एजेंसियां आम आदमी की जेब पर सरेआम डकैती डाल रही थीं? रेलवे की धांधली का यह खेल नया नहीं है, लेकिन एक बड़ी राजनीतिक रैली के दौरान इसे अंजाम देना इनकी बेखौफ मानसिकता को दर्शाता है। यह एक संगठित लूट की तरह प्रतीत होता है, जहां भीड़ को एक अवसर के रूप में देखा गया।
 हालांकि, मामला मीडिया और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद त्वरित कार्रवाई हुई और जबरन वसूली गई राशि वापस कराई गई, लेकिन सवाल वही है कि क्या हर यात्री को अपनी हक की लड़ाई के लिए उच्चाधिकारियों का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा? पैसा वापस मिलना एक तात्कालिक राहत हो सकती है, लेकिन जो मानसिक प्रताडऩा उन कार्यकर्ताओं ने झेली और जो दाग रेलवे की छवि पर लगा, उसकी भरपाई कैसे होगी? यह घटना एक बड़े सबक की तरह है। रेलवे को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्टेशन परिसर केवल ट्रेनों के आने-जाने का स्थान नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के सम्मान का केंद्र भी बने। निजी ठेकेदारों की मनमानी और रेलवे के अधिकारियों की ढिलाई का खामियाजा उन निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा, जो किसी पार्टी विशेष के नहीं बल्कि देश के नागरिक के तौर पर वहां मौजूद थे। ब्रिगेड रैली की भीड़ छंट जाएगी, भाषणों की गूंज शांत हो जाएगी, लेकिन हावड़ा स्टेशन के उन शौचालयों के बाहर खड़ा होकर अपनी बेबसी पर आंसू पोंछते कार्यकर्ता की छवि व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा रहेगी। यदि समय रहते इन वसूली केंद्रों पर लगाम नहीं कसी गई, तो सेवा शब्द केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा और आम आदमी इसी तरह सिस्टम की भेंट चढ़ता रहेगा।

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