वैभव सूर्यवंशी का लिस्ट-ए क्रिकेट में सबसे तेज अर्धशतक, महज 29 गेंदों में 94 रन ठोक दिए
कल्याण बनर्जी ने पूछा, क्या दिल्ली से चलेगा बंगाल का प्रशासन?
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा के साथ ही राज्य का प्रशासनिक गलियारा अब एक बड़े कानूनी और संवैधानिक संग्राम का केंद्र बन गया है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य के शीर्ष आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को पदमुक्त कर राज्य से बाहर भेजने के फैसले ने ममता बनर्जी सरकार और आयोग के बीच आर-पार की जंग छेड़ दी है।
तृणमूल के वरिष्ठ नेता और प्रख्यात वकील कल्याण बनर्जी ने इस मुद्दे को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ के समक्ष इस मामले को उठाते हुए कल्याण बनर्जी ने आयोग की शक्तियों की सीमा पर ही गंभीर सवाल दाग दिए हैं। उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप की मांग करते हुए पूछा है कि क्या चुनाव आयोग को यह संवैधानिक अधिकार है कि वह राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी जैसे वरिष्ठ पदों पर बैठे अधिकारियों को न केवल उनके पद से हटाए, बल्कि उन्हें दूसरे राज्यों में चुनाव ड्यूटी पर भेजकर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु बना दे? इस विवाद की जड़ें 15 मार्च को चुनाव की तारीखों के एलान के ठीक बाद से जुड़ी हैं, जब आयोग ने अभूतपूर्व तेजी दिखाते हुए राज्य की तत्कालीन मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती, गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीणा और डीजीपी पीयूष पांडेय समेत कोलकाता पुलिस कमिश्नर सुप्रतिम सरकार को उनके पदों से हटा दिया था। आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया कि इन अधिकारियों को बंगाल में चुनाव से संबंधित किसी भी जिम्मेदारी में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके बाद हुए दूसरे दौर के फेरबदल में 19 और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इधर-उधर किया गया, जिसमें हावड़ा, बैरकपुर और आसनसोल-दुर्गापुर जैसे महत्वपूर्ण कमिश्नरेट के प्रमुख भी शामिल थे। राज्य सरकार का तर्क है कि इस तरह के व्यापक तबादले, विशेषकर जब अधिकारियों को तमिलनाडु या कर्नाटक जैसे राज्यों में ऑब्जर्वर बनाकर भेजा जा रहा है, वह राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक निरंतरता के लिए बड़ा खतरा है।
अदालत में दायर जनहित याचिका के माध्यम से वकील अर्क नाग और कल्याण बनर्जी ने दलील दी है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था जरूर है, लेकिन उसकी शक्तियां असीमित नहीं हैं। उनका आरोप है कि आयोग राज्य सरकार के साथ बिना किसी परामर्श या समन्वय के एक अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है।
उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे पत्र में साफ कहा कि जिस तरह से बंगाल के अधिकारियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, वह निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के बजाय राज्य की मशीनरी को नियंत्रित करने की कोशिश अधिक लगती है। सरकार का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग के पास तबादले का अधिकार है, लेकिन अधिकारियों को राज्य की सेवा से पूरी तरह हटाकर बाहर भेजना सर्विस रूल्स का उल्लंघन हो सकता है। कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है और इसकी विस्तृत सुनवाई अगले सप्ताह के लिए तय की है। दिलचस्प बात यह है कि आयोग ने विरोध की बढ़ती लहर के बीच बिधाननगर और सिलीगुड़ी के पुलिस कमिश्नरों के तमिलनाडु तबादले पर फिलहाल रोक लगा दी है, लेकिन बाकी अधिकारियों की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
अब सबकी नजरें हाई कोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि आदर्श चुनाव आचार संहिता के दौरान आयोग और राज्य सरकार के अधिकारों के बीच की लक्ष्मण रेखा कहाँ है। क्या अदालत आयोग के इस 'ऑपरेशन क्लिन-अप' पर रोक लगाएगी या फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के नाम पर अधिकारियों का यह वनवास जारी रहेगा, यह आने वाले कुछ दिन बंगाल की राजनीति की दिशा तय करेंगे।