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200 पार की बात करने वाले अब 26 को तरसेंगे : कुणाल
कोलकाता। चुनावी दंगल में अब 'भरोसे' और 'पहचान की लड़ाई आर-पार के मुकाम पर पहुँच गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा राज्य में भाजपा सरकार बनने के दावों पर तृणमूल ने जोरदार पलटवार किया है। तृणमूल के राज्य महासचिव कुणाल घोष ने भाजपा के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि बंगाल को किसी बाहरी ताकत या झूठे वादों की जरूरत नहीं है, यहाँ की जनता को सिर्फ अपनी 'बेटीÓ ममता बनर्जी पर अटूट भरोसा है। इस बयान के साथ ही टीएमसी ने चुनाव को एक बार फिर 'स्थानीय बनाम बाहरीÓ के नैरेटिव पर लाकर खड़ा कर दिया है।
कुणाल घोष ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर तंज कसते हुए उन्हें 'फ्लॉप ज्योतिषियों की मंडलीÓ करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने '200 पारÓ का नारा दिया था, लेकिन जनता ने उन्हें 77 सीटों पर समेट दिया। घोष ने चुटकी लेते हुए कहा कि जिस तरह के हालात आज राज्य में हैं, उसे देखते हुए 2026 में भाजपा को 26 सीटें भी मिल जाएं तो बड़ी बात होगी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बंगाल के राजनीतिक मिजाज को समझे बिना दिल्ली से बैठकर किए गए दावे यहाँ की जमीन पर हमेशा धराशायी होते रहे हैं और इस बार भी नतीजे अलग नहीं होंगे। भाजपा के 'भय से मुक्ति और भरोसेÓ के नारे पर प्रहार करते हुए टीएमसी नेता ने कहा कि बंगाल के लोग किसी भी तरह के डर को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने कहा कि भाजपा जिन चुनावी वादों और योजनाओं का ढिंढोरा पीट रही है, वे दरअसल ममता के सफल मॉडलों की नकल मात्र हैं। कुणाल ने चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा पहले अपने शासित राज्यों में वैसी सुरक्षा और सुविधाएं लागू करके दिखाए जैसी बंगाल में लक्खी भंडार और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के जरिए महिलाओं को मिल रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा पहले तृणमूल की योजनाओं की आलोचना करती है और फिर चुनाव आते ही उन्हीं वादों को अपने घोषणापत्र में जगह दे देती है। महिला सुरक्षा और सिंडिकेट राज के आरोपों पर पलटवार करते हुए घोष ने भाजपा को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि भाजपा जिन नेताओं को सुबह तक 'भ्रष्टÓ बताकर कोसती है, शाम होते ही उन्हें अपनी वाशिंग मशीन में धोकर पवित्र कर देती है और बड़े पदों से नवाजती है। उन्होंने दावा किया कि महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मामले में बंगाल की स्थिति कई भाजपा शासित राज्यों से काफी बेहतर है। इस तीखी जुबानी जंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तृणमूल इस बार भी 'बंगाल की बेटीÓ के भावनात्मक कार्ड को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर मैदान में है, जबकि भाजपा केंद्र के 'भरोसेÓ के दम पर सत्ता परिवर्तन की आस लगाए बैठी है।