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टीएमसी नेताओं का आरोप है कि विधानसभा सचिवालय और स्पीकर उनके प्रति पूरी तरह से उपेक्षात्मक रवैया अपनाए हुए हैं
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब सदन के भीतर मुख्य विपक्षी दल के दर्जे और बुनियादी सुविधाओं को लेकर एक नया और बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी तृणमूल को अब तक आधिकारिक तौर पर विपक्ष के नेता का दर्जा और कार्यालय आवंटित नहीं किए जाने पर बुधवार को सदन के भीतर जमकर हंगामा हुआ। इसी मुद्दे पर अपनी शिकायत दर्ज कराने पहुंचे तृणमूल संसदीय दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय और जुझारू विधायक कुणाल घोष को जब विधानसभा अध्यक्ष रथीनाथ बोस ने मिलने का समय नहीं दिया, तो दोनों नेता आक्रोशित हो गए और स्पीकर के कक्ष के बाहर ही जमीन पर धरने पर बैठ गए।
टीएमसी नेताओं का आरोप है कि विधानसभा सचिवालय और स्पीकर उनके प्रति पूरी तरह से उपेक्षात्मक रवैया अपनाए हुए हैं। धरने के दौरान विधायक कुणाल घोष ने विधानसभा के आला अधिकारियों के सामने अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय पिछले 36 वर्षों से विधायक हैं और राज्य के बेहद सम्मानित राजनेता हैं, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष के नेता के रूप में उन्हें अब तक एक छोटा सा कमरा तक आवंटित नहीं किया गया है। उन्होंने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी की ओर से भेजे जा रहे आधिकारिक पत्रों की रिसीविंग तक नहीं ली जा रही है और सचिवालय का कोई भी अधिकारी उनके साथ सहयोग करने को तैयार नहीं है।
कुणाल घोष ने राज्य सरकार और स्पीकर पर सीधा हमला बोलते हुए सवाल उठाया कि जब नए विधानसभा भवन में स्पीकर और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के आलीशान कार्यालय पूरी तरह से सज-धज कर तैयार हो चुके हैं और वहां से कामकाज भी शुरू हो गया है, तो फिर लोकतंत्र के नियमों के तहत मुख्य विपक्षी दल के नेता के लिए अब तक एक दफ्तर की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? उन्होंने अधिकारियों को चेताते हुए कहा कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं है, बल्कि राजनीतिक सौजन्य और मर्यादा का भी पूरी तरह से हनन है।
तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की ओर से बीते 13 मई को ही स्पीकर रथीनाथ बोस को एक औपचारिक और प्राधिकृत पत्र भेज दिया गया था। इस पत्र में सदन के भीतर टीएमसी के 80 विधायकों के पूर्ण समर्थन के साथ शोभनदेव चट्टोपाध्याय को सर्वसम्मति से तृणमूल विधायक दल का नेता घोषित किया गया था। इस पत्र को सौंपे जाने के कई दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें अब तक विधानसभा में विपक्ष के नेता का आधिकारिक दर्जा और सुविधाएं नहीं दी गई हैं।
गौरतलब है कि 294 सदस्यों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा के नियमानुसार, सदन में मुख्य विपक्षी दल का आधिकारिक दर्जा हासिल करने और मान्यता पाने के लिए किसी भी पार्टी के पास कम से कम 30 विधायकों का समर्थन होना अनिवार्य है। तृणमूल कांग्रेस के पास 80 विधायकों के साथ इस तय आंकड़े से कहीं अधिक की संख्या मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद मान्यता और कार्यालय देने में की जा रही यह अप्रत्याशित देरी अब एक बड़े सियासी टकराव का रूप ले चुकी है। स्पीकर के कमरे के बाहर वरिष्ठ नेताओं के इस धरने ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में बजट सत्र के दौरान सदन के भीतर पक्ष और विपक्ष के बीच यह तल्खी और बढऩे वाली है।