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अब देखना यह है कि ममता बनर्जी इस अंदरूनी बगावत को दबाने के लिए क्या कदम उठाती हैं
कोलकाता। बंगाल की राजनीति में तृणमूल के भीतर सुलग रही असंतोष की आग अब पूरी तरह से ज्वालामुखी बनकर फट चुकी है। पार्टी के सबसे कद्दावर और मुखर चेहरों में शुमार, श्रीरामपुर से सांसद कल्याण बनर्जी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने ममता बनर्जी के सामने आर-पार की लड़ाई का सीधा विकल्प रख दिया है। कल्याण ने साफ शब्दों में कहा कि अब ममता को यह अंतिम फैसला करना होगा कि पार्टी में उनका भतीजा अभिषेक रहेगा या फिर उनके जैसे पिछले चार दशकों से खून-पसीना बहाने वाले पुराने और समर्पित कार्यकर्ता रहेंगे। विधानसभा चुनाव में पार्टी के करारी शिकस्त और खराब प्रदर्शन के बाद वैसे ही टीएमसी के भीतर नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे थे, लेकिन ममता के सबसे बड़े सिपहसालार रहे कल्याण का यह बागी रुख पार्टी के ताबूत में आखिरी कील माना जा रहा है।
इस भयंकर विवाद की तात्कालिक शुरुआत विधायक हस्ताक्षर जालसाजी मामले से हुई। इस मामले में कानूनी संरक्षण की मांग को लेकर अभिषेक बनर्जी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अधिवक्ता कल्याण का आरोप है कि उन्होंने इस संवेदनशील मामले को अदालत में प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध कराने के लिए दिन-रात एक कर दिया, लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर किसी दूसरे बाहरी वकील को केस की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इसी अपमान से आहत होकर उन्होंने खुद को केस से अलग कर लिया। अपनी नाराजगी और दर्द बयां करते हुए कल्याण ने कहा कि वह पिछले 45 वर्षों से वकालत के सम्मानित पेशे में हैं और इस तरह का जलील होना कभी स्वीकार नहीं कर सकते। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें अभिषेक द्वारा सिर्फ एक डस्टबिन की तरह इस्तेमाल किया गया, जो अभिषेक के चरम अहंकार और अति आत्मविश्वास को दर्शाता है। अभिषेक की कार्यशैली पर सीधा प्रहार करते हुए वरिष्ठ सांसद ने कहा, मैंने हमेशा अपनी जान दांव पर लगाकर दीदी का साथ दिया है, लेकिन अभिषेक की गलत नीतियों और फैसलों की वजह से आज पूरी पार्टी की छवि जनता के बीच तार-तार हो गई है। स्थिति यह है कि जब हम जनता के बीच जाते हैं, तो हमें 'चोर-चोरÓ के अपमानजनक नारे सुनने पड़ रहे हैं, इसके बावजूद अभिषेक का तानाशाही रवैया बदलने का नाम नहीं ले रहा है। खुद को बंगाल का सबसे ईमानदार राजनेता बताते हुए उन्होंने कहा कि उनका ममता से कोई पारिवारिक या खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी वह चार दशकों से उनके साथ संघर्षों में खड़े रहे। इसके विपरीत अभिषेक सिर्फ ममता के भतीजे हैं, इसलिए अब अंतिम फैसला दीदी को ही करना है कि वह रक्त संबंध चुनेंगी या वफादारी। कल्याण ने दोटूक शब्दों में चेतावनी दी कि अगर अभिषेक पार्टी के शीर्ष नीतिगत पद पर बने रहते हैं, तो वह भारी दुख के साथ तृणमूल को हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे।
उन्होंने यह बड़ा दावा भी किया कि वह वर्ष 2022 से ही अकेले अभिषेक बनर्जी के तथाकथित डायमंड हार्बर मॉडल और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते आ रहे थे, जिसे आज पार्टी के अधिकांश नेता और जमीनी कार्यकर्ता सही मान रहे हैं। राज्यसभा में चार सांसदों के ताबड़तोड़ इस्तीफों और सायनी घोष की रहस्यमयी चुप्पी के बीच कल्याण बनर्जी का यह खुला अल्टीमेटम ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती बन गया है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी इस अंदरूनी बगावत को दबाने के लिए क्या कदम उठाती हैं।