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चंद नेता और कार्यकर्ताओं को छोड़कर नहीं कोई दीदी के साथ
कोलकाता। हालिया चुनावी शिकस्त के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी बुधवार को पहली बार किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में सड़कों पर नजर आईं। महानगर के धर्मतला स्थित लेनिन प्रतिमा से शुरू होकर यह जुलूस सुबोध मलिक स्क्वायर तक पहुंचा। इस मार्च का मुख्य उद्देश्य राज्य में बिना किसी ठोस पुनर्वास नीति के हॉकर्स को हटाए जाने के खिलाफ एक कड़ा राजनीतिक संदेश देना था। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इस बात की खासी चर्चा रही कि अमूमन अपने आक्रामक तेवरों और ओजस्वी भाषणों के लिए जानी जाने वाली ममता बनर्जी ने इस बार कोई जनसभा नहीं की। जुलूस के सुबोध मलिक स्क्वायर पहुंचने के बाद वह बिना किसी संबोधन के सीधे वहां से रवाना हो गईं, जिससे यह पूरा कार्यक्रम एक मूक मार्च में तब्दील हो गया।
पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस विरोध मार्च की रूपरेखा केवल हॉकर्स के मुद्दे तक सीमित नहीं थी। तृणमूल इसके जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं पर हो रहे कथित हमलों और विभिन्न मामलों में उनकी गिरफ्तारियों के खिलाफ भी अपना विरोध दर्ज कराना चाहती थी। पिछले कुछ समय से ममता बनर्जी सीधे तौर पर सड़कों पर उतरने के बजाय सोशल मीडिया के माध्यम से ही अपनी बात रख रही थीं, हालांकि कुछ दिनों पहले उन्हें एक धरना कार्यक्रम में भी देखा गया था लेकिन बुधवार को हुआ यह मार्च चुनाव परिणामों के बाद उनका पहला बड़ा जमीनी आंदोलन था, जिसके जरिए उन्होंने एक बार फिर सड़क की राजनीति में लौटने का संकेत दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात जुलूस में ना तो भीड़ उमड़ी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी भी कम रही। अमूमन ममता बनर्जी के किसी भी सड़क प्रदर्शन में भारी जनसैलाब और कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ता है, लेकिन इस बार का नजारा बिल्कुल उलट था। रैली में आम दिनों जैसी भारी भीड़ दिखाई नहीं दी और तृणमूल के बड़े चेहरों की मौजूदगी भी बेहद सीमित रही। जुलूस की अग्रिम पंक्ति में कुणाल घोष और डोला सेन जैसे कुछ चुनिंदा और भरोसेमंद नेता ही मुख्यमंत्री के साथ कदमताल करते नजर आए, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है।
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों से आ रही खबरों के मुताबिक, राज्य में अवैध कब्जों को हटाने और बिना पुनर्वास के हॉकर्स पर हो रही कार्रवाई को लेकर जमीन पर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। विभिन्न स्थानों पर इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। इस मुद्दे पर वामपंथी दल पहले से ही आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और वे इसे एक संगठित आंदोलन का रूप देकर जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। शायद यही वजह है कि तृणमूल भी इस संवेदनशील मुद्दे को विपक्ष के हाथ में नहीं जाने देना चाहती।
इससे पहले हॉकर्स दिवस के मौके पर भी तृणमूल कांग्रेस ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए एक विस्तृत बयान जारी किया था। अब पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने खुद सड़क पर उतरकर इस आंदोलन को धार देने और इसे एक नया राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया है। हालांकि, बिना किसी भाषण या औपचारिक संबोधन के इस मार्च का अचानक समाप्त हो जाना राज्य की सियासत में कई नए सवाल खड़े कर गया है।